राहों की बाधा को देखकर, हम कदम नहीं रोकते हैं,
हम वो नहीं है जो मुश्किल में, अपनों को भूल जाएं। उठती हुई लहरों से जाकर पूछो, हौसला हमारा कितना है, हम लहरों के सीने पर भी, नाम अपना सजा आते हैं। तूफान की क्या हस्ती है, जो रोक सके मेरी आवाज को, मदद की खातिर उठती है, ये जिद और ये आवाज मेरी। पर्वत भी शीश झुका देते हैं, जब हम हुंकार भरते हैं, यारी के खातिर तो दुनिया में, हम मौत से भी लड़ जाते हैं। वो आंधियां भी हार जाती है, जो हमें डराने आती हैं, वो बिजलियां भी कांप उठती है, जो राहों में चमकती है। हम वो वीर धुरंधर हैं, जो चाहें तो हवा का रुख भी मोड़ दें, दोस्त पर आ जाए आंच तो हम अंबर को भी झकझोर दें। तूफान को लेकर आड़े हाथों, हम मंजिल तक जाएंगे, बन्शीलाल की कलम कहती हैं, हम यारी का पुरा धर्म निभाएंगे।
लेखक- कवि और पत्रकार बन्शीलाल थाकड़ ‘राजपुरा’













